मैं अपनी समस्या स्वयं हूं
खुद पर ही मैं श्रयम हूं,
मैं ही हूं जो खुद से रूठ जाती हूं
करके हजार प्रयास अंत में टूट जाती हूं
खो देती हूं खुद को
खुद के रचे उलझन में
फस जाती हूं मैं
अपने मन के दलदल में।
देख कर खुद को बिखरता हुआ
थोड़ी सी सहम जाती हूं
हार कर खुद से खुद पर
मैं थोड़ी सी रहम खाती हूं,
बड़े प्यार से अपनी बेचैनियों को
पल दो पल सवारती हूं
छोटी सी परेशानियों को
मैं स्वयं ही विस्तारती हूं।
ना जाने मुझे क्यूँ सब
जोड़ना होता है,
बदले मे उसके स्वयं
को तोड़ना होता है
अंजाम अक्सर मालूम
रहते है मुझे
मगर हँस कर सब
सहना होता है।
अपनी परिस्थिती के लिए किसे
जिम्मेदार कहूँ मैं
सच्चाई से कैसे इंकार करुँ मैं
अंततः, मैं अपनी समस्या स्वयं हूँ
मैं अपनी समस्या स्वयं हूँ।