मिलूं नहीं मैं कहीं तुम्हे तो
हार मत मान जाना,
दुनिया का कोना छोर किसी
छत पर आ जाना।
दोपहर की धूप हो या हो
रात की ओश,
मिलूंगी मैं वहीं तुम्हे
बेखबर मदहोश।
गवारा नही हर किसी का साथ
मैं अकेले ही रहती हूँ,
शायद मैं अभी तक
छोटे मसलों से डरती हूँ।
मसलें हल करना तो
भलीं-भांती आता है,
पर पता नही क्यूँ जी
शुरू मे ही डर जाता है।
भीड़-भाड़ तो छोरो,मुझे
फैमिली मे भी privacy चाहिये,
आप अच्छे हो या बुरे
अपने तक ही बने रहिए।
अकेलापन ही मुझे जाने
क्यूँ भाता है,
अपने ही cousin से ये
ना जाने क्यूँ शर्माता है।
हर रात सोने से पहले
आँखे ये रोती है,
क्या हर introvert ki जिन्दगी
ऐसी ही होती है??